ओ याद.. !
कहीं भी ,कभी भी
बेवक्त , बेवजह
तुम क्यों बरस जाती हो..?
आंखों की नमी
गालों को छू जाती है
तुम इतना क्यों सताती हो ?
सच ये भी है कभी कभार
चेहरे पर हंसी ला देती हो ।
भीड़ में आकर अचानक ही
तुम कर जाती हो तन्हा कभी
और कभी तन्हाई में अपनी
महफ़िल मुझ संग जमा लेती हो ।
ओ याद.. !
रूलाना , हंसाना तुम्हारा
सब ठीक है चलो
पर ये तो बताओ
कहीं भी ,कभी भी
बेवक्त , बेवजह
तुम क्यों बरस जाती हो.. ?
- प्रतिमा पांडेय


