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नक़ाब


कहानी कुछ और थी,हकीकत कुछ और...

बनते थे जो बड़े सीधे ,उनके दिल में था चोर ।

खौफ़नाक से चेहरे पर ,मासूमियत का था नक़ाब ।

समझ नहीं पाता कोई उसे,जो नहीं करता कभी गौर ।

— प्रतिमा पांडेय
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