हे मनुष्य ! सबसे बुद्धिजीवी तुम ही हो इस धरा पर
होता है मुझे बड़ा ही अचरज यह जानकर।
यदि है ऐसा तो प्रकृति है तुम्हारी माता समझ नहीं पाते
तुम किस कारण ..!
जानबूझकर तुम बनते हो अनजान या हो सच में नादान।
आज बताओ सच क्या है? बढ़ती जा रही है मेरी
जिज्ञासा।
कभी गुरु बन जाती ,कभी बन जाती हैं हमारी मित्र,
करती है हमारा भरण-पोषण सदा, जैसे करती हैं हमारी
धात्री ।
सच तो यह है ,दिया नहीं कभी तुमने ध्यान,
क्यों करूं मैं फिर तुम्हारी बुद्धि का मान।
पर्वत ,पेड़ ,पहाड़, नदियां ,झील और झरने यह सभी हैं मां
की संतान,
चलो कराऊं तुम्हें मैं ज्ञान।
नहीं मानती मैं,सबसे बुद्धिजीवी तुम ही हो धरा पर।
पशु-पक्षी और अन्य जीव हम सब हैं एक परिवार।
मां प्रकृति की गोद महान , है ईश्वर का हमें दिया वरदान।
चलते चलते कभी जब तुम थक जाते हो राह में ,
सिर पर चढ़ी होती है धूप, तुम्हें लगती है प्यास और भूख।
तब पेड़ करते तुम्हारा स्वागत, अपनी बाहें फैलाकर ।
सोचा क्या! तुमने कभी करते हैं, तुम्हारा कितना आदर।
अपनी छांव मैं तुम्हें रख लेते कभी,
कभी खाने को देते फल। कभी जो तुम होते उदास, इनके फूल तुम्हें हंसाने का करते प्रयास।
प्राण वायु की है दाता ये ,इनसे ही तुम्हें सांस आए ।
मां प्रकृति की सभी हैं संताने ,हो चाहे नदी पर्वत, झरने या फिर हो पेड़, पशु - पक्षी यह सभी हैं, तुम्हारे बहन और भाई।
इतनी सी बात तुम्हें समझ नहीं आई
तो कैसे तुम बुद्धिजीवी भाई । नदियां देती तुम्हें नीर, पल में बुझ जाती तुम्हारी प्यास। देख ,मां का हरा भरा आंचल, तुम्हारा बन जाता हर दिन खास ।
पक्षियों के बिना तुम्हारी ,सुबह होती कितनी उदास। फूलों को तो देख बस मन महक सा जाता है और तमन्नाएं
जाति हैं रंग, इन पर बैठी के तितलियों के संग।
जब लग जाता है तुम्हें कोई रोग ,
तभी दुआ सी दवा लगाने मां प्रकृति ही आती काम।
कितना सुंदर कितना प्यारा, इनसे है तुम्हारा नाता ।
काश कभी तू ये समझ पाता ,
इतना ना मां को फिर रुलाता ।
नहीं मानती मैं कि तू है सबसे बुद्धिजीवी इस धरा पर ।
कितना निस्वार्थ प्रेम तुमसे करते हैं प्रकृतिजन्य सभी तुम्हारे
भाई बहन ।
बिना लाभ के बिना दाम के तुम्हें सब देते अनमोल
कभी पानी, कभी छांव, कभी फल, कभी फूल और बहुत कुछ।
तुम क्या करते हो इनके संग बोलो
अपनी स्वार्थ सिद्धि का तुम्हें हैं केवल ध्यान ।
कभी जंगल देते तुम काट, कभी किसी नदी को देते हो पाट, कभी उड़ा देते कोई पहाड़ और बहुत से तुमने किए हैं अनगिनत अपराध ।
एक दिन तुम ने दिया था मेरा और मेरी सहेलियों का भी नीड़ उजाड़, जब अपना उद्योग लगाने को तुम रहे थे हरे भरे पेड़ उखाड़, चारों तरफ मच गई थी चीख -पुकार।
जंगल के मेरे सभी साथी कर रहे थे हाहाकार
लेकिन तुमने अपने ही भाइयों की दी जड़े उखाड़।
उड़ते उड़ते गई मैं अब थक, अब तक ढूंढ रही हूं तब से
बिछड़ गए मेरे मां और बाबा..।
नहीं है मुझे तुमसे कोई आशा, मैं हूं बहुत हताश। क्या मनुष्य की यही है परिभाषा ,सोच रही हूं मैं आज ।
पल भर की खुशी के लिए ,जला देते तुम बारूद , कर देते हो सारी हवा खराब, होती तुम्हें सच में बुद्धि अगर तो तुम कम से कम पशु पक्षियों का तो रखते ध्यान । बारूद की आवाज से ,नहीं रहते बहुत से प्राण । नहीं होता उनका हिय तुझसा कठोर,शोर सुन हो जाते हैं
बहुत परेशान।
लेकिन तुम्हें कहां इसका ज्ञान ,आखिर बुद्धिजीवी कहलाते
हो ना तुम इंसान।
जाते करने स्नान नदी और घाट, जाकर वहां दे देते हो, बदले में तुम कूड़ा तमाम।
क्या! तुम्हें नहीं आता जरा भी ध्यान , इनका संरक्षण ही बचा सकता है सदा तुम्हारे प्राण।
मत भूलो ! ब्रह्मांड में है और बहुत से ग्रह ,
किंतु केवल धरा पर, ही है जीवन संभव।
जीना हो जाएगा तुम्हारा दुष्कर,
यदि मां प्रकृति का तुम्हें लगेगा श्राप।
जितने प्रिय इन्हें तुम हो ,उतना ही है हर प्राणी इन्हें प्यारा।
मां ने दिये हैं तुम्हें इतने अनुपम उपहार ,
और तुम कर रहे उन्हें ही बर्बाद,
ऐसे क्या रह पाओगे तुम आबाद।
हनन किया है तुमने बहुत ,अभी करो तुम इनका संरक्षण।
देना चाहो जो मां प्रकृति के क्रोध को विराम।
यदि तुम रखो मां प्रकृति का ख्याल,
सदा रखो इन्हें संभाल ।
तब जाकर धरा रहेगी स्वर्ग से सुंदर,
प्रकृति मां को होगा तुम बच्चों पर अभिमान ।
तुम ही हो सबसे बुद्धिजीवी धरा पर, मैं भी लूंगी यह मान ।
प्रतिमा पांडे

