जिंदगी में कभी सोचा नहीं था ,लौटेंगे विद्यालय के वो खट्टे मीठे पल
जो बीत गए थे कल ,रह गए थे बस कहीं यादों में कैद होकर
कविशाला जब से मिली मानो फिर जी रहें हों बीता हुआ वो हर क्षण ।
कविताओं से सजा हुआ है, इस शाला का प्रांगण
एक नहीं अनेकों भाषाओं में है ये उपलब्ध ।
नित नया सीखते हम यहां
गुरु समान महान कवियों की कृतियां पढ़कर।
कविताओं का होता यहां पर पाठ
कविताएं ही लिखी जाती यहां निर्बाध।
केवल पढ़ना -लिखना ही नहीं
सुनना -बोलना भी चल रहा साथ
कविशाला के लाइव शोज व ऑफलाइन मीटअप
कर रहें हैं अभिव्यक्ति का यह भी काम ।
नए कवि भी है यहां अपनी रचनाओं के संग
शाला की कक्षा के मानो सहपाठि हों सब।
कविताओं की है क्लास यहां,
है कविताओं का यह स्कूल।
अब तक सो रहीं थी कविताएं कई, डायरी के पन्नों पर
किसी अलमारी में बंद होकर
धूल जमती ही जा रही थी इन पर
सृजनात्मकता को देती हुई आवाज जगाने इन्हें
एक दिन आ गई कविशाला खुद चलकर ।
बस फिर क्या था शुरू हो गया इन कविताओं का
सफर अपनी मंजिल तक पहुंचने को लेकर।
अब तो लगता है इन दबी हुई कविताओं को लग
गए हो पंख।
करते हैं कोटि-कोटि धन्यवाद कविशाला का
देने को कवि और कविताओं से सजा इतना सुंदर मंच।
प्रतिमा पांडेय।


