जो आवाज़ उठाए तो सदियों से बहरे कानों को भी सुनाई दे

गलत को सही बना ही दे

लिखे जो दो मीठे बोल

लगभग टूट चुके रिश्तों को भी दे जोड़  

अपनी ताकत से हवाओं का भी दे रुख मोड़ 

जाने क्यों इसकी खूबियों को देख 

लिखते लिखते कई बार ख्याल हो आता है

दादी नानी की कहानियों में जो थी जादूई छड़ी

कहीं ना गईं हो वो पारियां यहां छोड़

सही हाथ जो लग गईं हैं लेकर कलम रूप

 तो स्याही से

 ही भर रहीं हैं जीवन में खुशनुमा रंग कई

गलत अगर जो हो रहा हो 

कर देती उसे सही

प्रेम की परिभाषा लिखती कहीं

लिखती है गीत कहीं

जीवन में सच्चाई से ही है इनकी प्रीत रही

सबका मन अपनी बेबाकी से सदा से है जीत रही..।


@Pratima Pandey