मन कहता है आज उन पर भी कुछ लिख जाऊं,
कोई नहीं सुनता जिनकी करुण व्यथा,
क्यों ना उनकी कहानी सुनाऊं,
शायद उनका दर्द मैं कुछ तो कम कर पाऊं ।
जिसकी किसी से ना कोई है आशा ,
हर तरफ जिसके जीवन में फैली हुई है हताशा ।
चाहत जिसकी है रोजगार पाना,
कुछ कमाकर उसे अपने बूढ़े मां बाप को है खिलाना ।
बेरोजगार है वो काम पाने को बेकरार है वो ।
अपना हुनर दिखाने को उसे एक मौके की तलाश है,
रोजगार पाने का सपना ही उसके जीने का आधार है ।
रोजगार और बस रोजगार की उसे तलाश है ।
आज वो हर घर में मिलता है।
लगभग टूट चुका है हौसला उसका,
फिर भी जी तोड़ मेहनत करता है।
सड़कों पर मारा - मारा फिरता है,
नौकरी की आस में हर तप करता है।
धूप में जलता है,
भूख से तड़पता है,
परिवार की उम्मीदों का टांगे हुए बस्ता,
दिन - रात चलता है ।
आराम उसे नहीं सुहाता,
रोजगार की बस तलाश है उसे,
कुछ और नहीं है उसे भाता ।
दर्द उसकी सूनी आंखों में झलकता है,
बेरोजगार होने का गम लेकर वो ना जीता ,ना मरता है ।
रात के गहरे सन्नाटों में कागज कलम थामे,
अपनी किताबों से पूछा करता है,
इतना पढ़ लिखकर भी क्यों वह दर - दर भटकता है।
चुनावों का दौर जब भी आता है,
उसका उदास चेहरा थोड़ा सा खिल जाता है।
झूठे वादों का गुलदस्ता जो उसे मिल जाता है ,
जिसे सच समझ वो नौकरी पाने के ख्वाब बुनने लग जाता है।
हर नेता तब उसका सुभेच्छ बन जाता है।
जीत जाने के बाद उसे कहां पूछा जाता है,
बेरोजगार है वो उसको कौन सुनना चाहता है ।
हां ! बेरोजगार है वो ।
रोजगार की बस करता तलाश है वो
बेरोजगार है वो ।
@प्रतिमा पांडेय
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