बेहतरीन की चाह में लोग बेहतर से भी धो लेते हैं हाथ

बेहतर खड़ा दरवाज़े पर कर रहा होता है इंतजार

वो अपने घर की खिड़की से बेहतरीन को रहे होते हैं निहार

बेहतर आखिर कब तक तकेगा उनकी राह

उसके भी कम नहीं होते भाव

लौट जाता है वो उल्टे पांव

ढुंढने अपने हिस्से की प्यार भरी छांव

चाहे शहर हो या गाँव

कहीं तो मिलेगा वो जिसे उसकी चाह हो

जो बस तक रहा उसी की राह हो

ओ ! बेहतरीन को चाहने वाले जब तक तुम दरवाज़े पर आओ

बसा चुका होगा बेहतर अपना खुद का छोटा सा शहर या गांव

क्या होगा जो तुम अब सुधर भी जाओ

बेहतर को अब तो तुम फूटी आंख भी ना भाओ ।

बेहतर और बेहतरीन तो गए तुम भी जाओ

जाकर खिड़की पर ही टकटकी लगाओ

क्या पता कभी तो किसी का साथ पाओ

या फिर जीवन भर हाथ मलते रह जाओ ।

@Pratima Pandey