कितनी आसानी से कह देते हो ना तुम कि औरतों को समझना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन है । बस झाड़ लेते हो अपना पल्ला इतना कहकर.. उसे तुम समझना ही कब चाहते हो , इसलिए बहाना बना निकल जाते हो।
जरूरत कहां है उसे समझने की .. ! वो तुम्हें समझ जाती है तो तुम्हारे लिए काफी है, क्या ही फर्क पड़ता है तुम्हें की वो क्या चाहती है..।
फुरसत में हो तो सोचना कभी, उसे भी समझो तुम जैसे वो तुमको समझ जाती है इतनी सी चाहत है उसकी वो भी वो लफ्जों से नहीं कहा करती है ।
तुम्हारे बिना कुछ कहे तुम्हारी बहुत सी बातें समझ जाती है अन्तर्यामी नहीं है वो जी हां अन्तर्यामी नहीं है वो पर समझ लेती है तुम्हें क्योंकि वो समझना चाहती है,खुद को भूल कर तुम्हारी जगह अपने आपको रख तुम्हारी ही नज़रों से तुम्हें देखती है तब जाकर तुम्हें समझ पाती है।
अपने होने के अहम को प्यार के बीच कभी नहीं लाती है तब कहीं जाकर तुम्हें वो समझ पाती है।
वो भी तो कह सकती है ना कि तुम्हें समझना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन भी है ...... !
- प्रतिमा पांडेय


