मैं हूं मीठी ।

हॉस्टल में रहा करती हूं ,

इलाहाबाद विश्वविद्यालय में पढ़ा करती हूं । पास ही है एक इंटर कॉलेज , पापा का हाथ बटाने को कुछ खुद भी कमाने को मैं वहां नौकरी किया करती हूं।

एक दिन पापा का खत आया था, फौरन घर बुलाया था। बात क्या थी नहीं बताया था ।

अभी आ गई मैं घर पर, थोड़ा सफर कर, कुछ छुट्टियां लेकर।

दीदी भी आई थी ,संग बच्चों को भी लाई थी।

दीदी से पूछा मैंने ,कोई काम निकल आया है क्या ..? पापा ने हम सब को क्यों बुलाया है यहां।

दीदी मुस्कुरा कर बोली मेरी प्यारी मीठी चल रही है तेरी शादी की बात, लगभग तय हो गया है सब बाकी बस आना बारात।

जल्द ही फिर तेरे भी पीले होंगे हाथ ।

मैं घबरा गई थी जानकर यह बात, मन हो रहा था बेकरार ,जानने को मां से सारी बात पर, मां तो गई थी बड़े बाजार ।

शाम को जब मां घर आई तब जाकर मन की उलझन सुलझाई ।

देखो मीठी! ध्यान से समझो मेरी बात शादी से ना करना किसी कीमत पर तुम इनकार,दीदी बीच में थी बोली लड़का शहर में डॉक्टरी पढ़ रहा है यार।

इतना पढ़ा लिखा है ,फिर भी है पूरा संस्कारी ,मां-बाप के कहने पर हो गया है ,झट से राजी समझी मेरी मीठी प्यारी ..!

ऐसे ही थोड़े इतने बड़े घर का लड़का है जी ,पापा से बोली थी मां ,पापा भर रहे थे हामी..!

मेरे मन में था फिर भी संदेह पूछ लिया हिम्मत रख, मां से क्या लेंगे नहीं कोई दहेज ..।

मां थोड़ा गुस्से में बोली, यह बड़ों की बात है तो बड़ों को ही करने दे बेटी।

भगवान का दिया सब कुछ है भावी समधी जी के पास ,

उन्होंने कहला भेजा है बस संस्कारी बहु की है आस ।

बाकी कुछ ना उन्हें चाहिए, तुम्हारे पापा को बुलवा भेजा है आज।

रात पापा जब घर आए किसी बात की चिंता थी उन्हें सताए ,मां ने पानी का गिलास थमाया ,साथ में अपना प्रश्न उठाया क्या हुआ जी !सब रहा क्या ठीक ? पापा बोले समधी जी से नहीं थी ऐसी उम्मीद..! मां ने घबराकर पूछा ,मांग रहे क्या मोटर कार या फिर बंगला देना होगा उपहार।

अरे नहीं !यह सब ना मांगते हैं वह उनका कहना है पढ़े-लिखे घर के आधुनिक हैं वह लोग..।

बस दूल्हे राजा की पढ़ाई का खर्च उठाना है,

बाकी सब कुछ है भगवान का दिया उनके पास ना लेंगे एक कौड़ी भी कह रहे थे ,होने वाले संमधि जी आज ।

लेकिन शहर के सबसे बड़े होटल क्लार्क में ही होगी शादी और सगाई , कार्ड पर होगा बस सोने का वर्क ।

हर रस्म होटल क्लार्क में ही जाएगी निभाई

तभी बनने देंगे अपने बेटे को हमारा दामाद संमधी भाई ।

उनके दोस्तों व रिश्तेदारों को देना है जरूरी सोने का एक उपहार, साथ में कपड़े भी रखने हैं और देने होंगे पैसे भेंट स्वरूप तीन चार हजार ।

कह रहे थे मेरे सारे रिश्तेदार दिल्ली और मुंबई में ही रहते हैं मिश्रा जी , देखिएगा नाक न कटने पाये हमारी जरा भी।

बस इतने पर ही हो गए हैं समधी जी राजी,

कहने लगे नहीं लेंगे हम दहेज जरा भी ,पढ़ा लिखा आधुनिक सोच वाला परिवार है हमारा ,बस बहू चाहिए थी अच्छे संस्कारों वाली..।

बाकी आप सहर्ष जो देंगे वह हम रख लेंगे निसंकोच ,बाप के जज्बात समझते हैं न हम लोग ,देखो !मीठी की मां !कितनी अच्छी है इनकी सोच।

इतना ही कर दो आप मिश्रा जी तो आपकी बेटी हुई बहू हमारी, जल्दी बताइएगा जरा जी, मेरा लड़का बड़ी ही मुश्किल से हुआ है राजी।

खरवास लगने से पहले करनी ही है मुझे उसकी शादी बता दे, आपको बात चल रही है उसकी और जगह भी ।

कहीं देर ना हो जाए, जल्दी से आप घर जाएं, सारी व्यवस्था करें तब मंडप सजाएं। बस इतनी ही हुई संमधि जी से बात।

बेटी है भाग्यशाली हमारी, वरना कहां मिलता है आजकल ऐसा परिवार।

चलो शुरू करते हैं, अब शादी की तैयारी !

पुश्तैनी जमीन गांव की बिक जाएगी तो सगाई की सारी व्यवस्था चाक-चौबंद हो जाएगी ।

जमा पैसों से ना होगा काम ,होटल क्लार्क के हैं ऊंचे दाम ।

जब आएगी शादी की बारी , तब ये मकान गिरवी रख के निपटा देंगे जिम्मेदारी ।

दामाद जी की डॉक्टरी की पढ़ाई का भी खर्च उठाना है , बेच देंगे वह ठिकाना भी, गांव में जो बहुत पुराना है ।


लेकिन ऐसे आधुनिक सोच वाले परिवार का रिश्ता नहीं है ठुकराना ,मीठी को भी है समझाना ,कर ना दे कहीं शादी से इनकार ,पढ़ी लिखी है आखिरकार ।

मां पापा समझे थे मैं सो गई थी , लेकिन मैं चुपचाप सारी बातें सुन रही थी ,समझ रही थी आधुनिक लोगों के आधुनिकता भरे विचार।

कैसे आधुनिक हो रहा दहेज भी आज......।

प्रतिमा पांडे..