धर्म पर अधर्म हो रहा भारी ,
आ जाओ ना अब गिरधारी ।
सब तरफ नफरत छा गई है ,
कान्हा धरा तुझे पुकार रही है ।
प्रेम की सुधा फिर बरसाने को ,
आ जाओ ना मोहन लेकर राधे को ।
मानव भेष धरे यहां कुछ राक्षस घूम रहे,
पृथ्वी मैय्या का हैं वो सुख चैन छीन रहे ।
अन्धकार का साम्राज्य बढ़ता ही जा रहा है,
हे मधुसूदन ये जग त्राहि त्राहि चिल्ला रहा है ।
आ जाओ ना श्याम प्यारे हम सबके रखवाले ,
सिर्फ तुम्हीं हर सकते हो चहुं ओर फैला ये तम।
अब और देर ना कर, जल्दी पधारो हे गिरधर ,
विनती सुनो हमारी, हे राधा रानी के बनवारी ।
~ प्रतिमा पांडेय


