इक जमाने के बाद जाके
आज मैंने इज़हार किया,
मैं भी दौर-ए-ग़म में ख़ूब जला,
उसे भी ख़ून के आँसू रुलाया।
उसका ज़वाब सुनने को बेचैन,
मैं हूँ अपनी बेताबी छुपा रहा,
वो झट से लगी मेरे गले सिसकते
और कहा ये सफ़र बड़ा लंबा रहा।
मैं परेशान था उसकी इस हरक़त से,
देख हैरान भी रहा मैं मेरी बरक़त से।
काश आग़ोश में ही कटे बाक़ी सारी उम्र,
उसके इक लम्स को इतना था तरसा, के
अब इसके आगे नही मुझे ज़न्नत की फ़िक्र।
उसका माथा चूमा तो इतनी खुशी हुई,
मैं जी भरकर रोया उसे सीने से लगाकर।
