कुछ मुलाक़ात खास होती है,कुछ पलों में ही सिमट कर रह जाती हैं

और फिर ताउम्र रह रह कर सताती है|


कसूर मुलाकातों का है या उन मुलाकातों के किरदारों का

जिनसे रोशन थी वो,अब तड़प है दीदारों का|



उन मुलाकातों के पहले और बाद की बेचैनी

पल पल मन को पुलकित कर होंठों पर बिखरती खुशियों की निशानी|


हर आहट पर आमने सामने नज़रों के झुक जाने का सिलसिला

कुछ कहना फिर चुप रह जाना,अपने आप ही मुस्कुराना,और बढता रहा काफिला|


कभी कभी लगता है कुछ पलों की मुलाकात का ये अमिट अंकन

जिंदगी भर दिल के कोने में हर घड़ी करता है कंपन|