इक ख्याल जिसका स्वर मद्धम है...

कहते हुए उसकी धड़कन में भी हलचल है ...



ख्याल आया क्यों.?

इस मेहमां को दावत- ए -दिल में बुलाया क्यों?


ख्याल ऐसे ही नहीं आते,

कुछ पुराने किस्से हैं जो नए पन्नो पर अपने निशां बनाते|


उस ख्याल का क्या कीजिए, जो रूह तक सुन रही है,

धीरे धीरे ख्वाहिशों की ताबीरें नए रंगों के ताने बुन रही है|


प्रतिभा पाल