शब्द न समझ सके तो...
चुप्पी क्या पड़ सकोगे तुम...
इस अजीब से रवैये से...
क्या मुझे हरा सकोगे तुम...
बेपनाह ज़िंदगी के इन आवारा सपनों को...
क्या पूरे कर सकोगे तुम...
इस उबाल खाती गर्म मंज़िल को...
क्या अपने कोरे हाथों से छू सकोगे तुम...
समंदर की उन लहरों को भी अभिमान है खुदपर...
क्या अपनी कश्ती को उस दरिया में बहा सकोगे तुम... ?!
:-प्रथमेष
