गाँव से शहर लौटने पर

घर से निकलते वक़्त

हर बार माँ की आंखों में शगुन के आंसू होते है

जो मुझे अहसास कराते हैं कि

हम दोनों में से किसी एक की यात्रा अवश्य पीड़ा से भरी होगी


गाँव से शहर लौटने पर

घर से निकलते वक़्त

हर बार पापा के ओंठ पर एक गहरी चुप्पी होती है

जो मुझे अहसास कराती है कि

हम दोनों में से कोई एक इस यात्रा में अवश्य छला जायेगा ... 


गाँव से शहर लौटने पर

घर से निकलते वक़्त

हर बार बहिन रख देती है मेरी बुरशट की जेब में अपने चंचल असबाबों की एक लंबी फेहरिस्त ,

जो मुझे अहसास कराती है कि

इस दुनियाँ के किसी एक छोटे से हिस्से में,

मेरे लौटकर आने की संभावना अभी भी शेष है|

-प्रतीक कौशिक