तेरी बेटी


तूने मुझ पर गर्व किया

मैं पदक जीत जब आई थी

दो पैसे तूने ज्यादा दिए

जब नाम मैं थोड़ा कमाई थी।


हाथ तेरा बटाया था

काम तूने सिखलाया था

तेरे संग जो भी पल बीते

सबने मन को हर्षाया था।


बुखार हुआ मैं सिसक गई

मुझसे ज्यादा तू बिलख गई

जो दवाई नहीं मिलती मुझको

तो मानो जैसे जान गई।


बहुत लाड़ लड़ाई तू

मुझे जान से ज्यादा चाही तू

फिर गया लड़कपन आई जवानी

राजकुमार संग मुझको ब्याही तू।


मेरे हर दुख में तेरा अश्क झलका

बेहद करीब था अपना नाता

मैं हस्ती तू हस देती थी

तू मेरी प्यारी मां।


बस काश तू मुझको आने देती

सुख दुख संग निभाने देती

न तू कराती तब गर्भ खाली

और ये कविता मुझे कह जाने देती।

और ये कविता मुझे कह जाने देती।।


- प्रतीक जैन