"इश्क़"
इजाज़त नहीं लेता कभी किसी से, बिना पुछे हो जाता है।
किसी की सुनता भी नहीं, बस अपनी ही बात मनवाता है।।
सोने भी नहीं देता रात भर, सिर्फ "करवट" बदलवाता है।
फिर भी सब अच्छा लगता है, "इश्क़" कितना पागल बनाता है।।
खुद पे ज़ोर नहीं चलता बिलकुल, बस उसकी हाँ में हाँ मिलवाता है।
गलतियाँ सब पकड़ते हैं दूसरों की, अपनी नज़र-अंदाज़ करवाता है।।
हसी-मज़ाक, रूठना-मनाना, बड़ी शिद्दत से सब कुछ सिखाता है।
खुद का ज़ादा ध्यान रखने के बाद भी इंसान बावला हो जाता है।।
क्या है इस में ऐसा? जो झगड़े के बाद और करीब ले आता है।
जादू-टोना जानता है ज़रूर, जो इस तरह से फांसले मिटाता है।।
कोई कितना भी विद्वान सही, किसी के भी समझ नहीं आता है।
और पढ़ने को ढ़ाई अक्षर प्रेम के, कोई अनपड़ भी पढ़ जाता है।।

