अब हमकों कुछ यूँ ख्याल आते हैं

चलो खूद को मारकर दरिया मे डाल आते हैं

मुकद्दस ओ मुफलिस रहते हैं दरिया मे

हम गुजरते है तो इक सिक्का डाल आते हैं

गमो मसर्रत के दरम्यान इक खानकाह है

जो भी आते हैं वहाँ से बेख्याल आते हैं