ऐसी सजा ऐ गुनाह दी जाती है
हमें रातों को नींद नहीं आती है
चाँद तो होता है मयस्सर लेकिन
छत पे वो चाँदनी नहीं आती है
मैं रात सदाएं देता हूँ उसको मगर
कोई आवाज लौटकर नहीं आती है
मेरे दोस्त तू सलामत रहे लेकिन
हमें तेरे हक में दुआ नहीं आती है
तेरे अलावा भी मुझे प्यार है मगर
वो अब दीवानगी नहीं आती है


