साँस लो कि न लो
रूह की अंगडाई
पिछा नहीं छोड़ती
मेरा यार कब का गुजर गया
ये मोहब्बत हैं
अकेला नहीं छोड़ती
किताबे जिस्म
इक बार में पढ़ ली जाती हैं
पर किताबे रूह
तमाम उम्र पिछा नहीं छोड़ती
मैं कहीं पर भी
सर झुकाऊँ
सजदा तेरा ही
जब तक ये निगाहें
पीना नहीं छोड़ती
