खड़ा मैं दोराहे पर राही और मुसाफिर नहीं

में खुद चलू ये जरूरी भी तो नही

फिर मेरी क्या जरूरत इन राहो पर 

कही मैं प्रहरी तो नही

पर हाथ मेरे निःशस्त्र वाचाल से मेरे च्छु जिनपर आरोप है भटक जाने का 

तो कही मैं मददगार तो नही 

पर संयम और ध्यान से मेरा रिश्ता ही क्या 

राग और अनुराग को हर घड़ी मैं खोजता 

मैं अबोध निरंकुश अभिमान मैं भीचता

पाव जिसके थिरकते भटकते दरख्तों की सुराहो मैं,    नही मैं नही ये तो नही

तो कही मैं निर्माता तो नही इस राह का विधाता तो नही

हा ये उपहास होगा प्रकृति का उसकी सुंदरता का क्षमता का बुद्धिमत्ता का

मेरे निशान ही प्रमाण है विनाश का त्रास का 

निसंदेह इन हस्त की नलियों से इतनी सुंदर गलियों का निर्माण अमूमन असंभव

तो मैं यहां क्यो खड़ा अगर ना ही मुसाफिर हूं और ना ही राही ना प्रहरी ना मददगार ना निर्माता और ना ही विधाता 

मैं अज्ञान भटका हुआ, विपरीत मुख मे खड़ा 

मंजिले पग तले और मैं कही दूर बहुत दूर चला 

रात को आकाश मैं सूरज को तकता रहा

दिन के प्रकाश में, मैं भटकता रहा 

ताल पे भटके कदम को मैं सुलझाता रहा और अंतराल की खामोशियो को में गुनगुनाता रहा

में मलिन कहता रहा हर तख्त जो श्याही लिपि 

मन पर खड़िये से कोई शब्द उकेरा ही नहीं 

विपरीत हैं सम विषम अनंत शून्य प्रकृति पुरुष  

पर प्रथक नही 

अश्वेत हूं में श्वेत प्रतीत होते मृगमरीचिका को सत्य समझता रहा

तन और मन मैं विभेद कर सलिल, शशांक उद्धव को कर मैं समेटता रहा

योग और जोग में रजता रहा सजता रहा

प्रतिबिम्ब को यथार्थ समझ में सदैव चलता रहा

अब क्या...क्या कोई निष्कर्ष होगा

हां विराम...

विराम कर ...मुठ्ठी भर और रेत को बहने दे 

खोल कर कपोल को हर दृश्य को कहनें दे.. छूने दे गहराई को और रोक उन कतार को जो फेफड़ो को चली 

भंजन के अवरोध से जिह्वा है निकल पड़ी 

यथार्थ के मुहाने को नाड़ियो से पीता जा 

मन के परिवेश में प्रेम से तू जीता जा।

ना जीत है ना हार है छड़ भर का त्यौहार है

तू प्रेम के परिवेश मैं मन लगा कर जीता जा

यथार्थ के मुहाने को नाड़ियो से पीता जा।।