एक इंसान हुँ जि़न्दगी को
मेरा मजा़क न बना
अभी जि़न्दा हुँ मै
मातम तो न मना
मै न समझ पाया
उस बेरहम सितमगर को
खुद को वफा़ का नाम देकर
मुझे मुरदा न बता
इल्जाम आवारगी का नही
इसे दीवानगी कहो
मुकद्दर ने मारा मुझको
कफ़न तो न ढालो
मै गुनहगार तो हुँ
मगर गुनाह मेरी दीवानगी का है
मोहब्बत मे डूबे हुए
बस एक सादगी का है
खौफ खुदा से कर
इस दीवाने का जनाजा़ न सजा
इकबाल जुर्मे-ए-मोहब्बत मे
इस दीवाने को जि़न्दा न दफना
एक इंसान हुँ जि़न्दगी को
मेरा मजा़क न बना...


