हे बुद्ध तथागत! चरणों में मैं याचक बनकर आया हूं

तुम मुझको प्रज्ञावन करो मैं शरण तुम्हारी आया हूं


मैं पंचशील भी अपनाऊं, आर्यों को सत्य मानता हूं

मैं करूं साधना लगातार, ये प्रण भी अभी ठानता हूं

मैं पहले तेरा उपासक हूं अब याचक बनकर आया हूं

मुझको लौटाओगे कैसे मैं शरण तुम्हारी आया हैं

वंदन करता हूं तात और चरणों में शीश नवाता हूं

अर्पित करने को धूप, दीप और फूल साथ में लाता हूं

ये भेंट करो स्वीकार साथ कुछ और नहीं मैं लाया हूं

तुम मुझको प्रज्ञावान करो मैं शरण तुम्हारी आया हूं


हे महाबुद्ध! इस साधक पर इतनी करुणा बरसा देना

मैं शील, समाधि में लीन रहूँ इतनी प्रज्ञा मुझको देना

आष्टांगिक मार्ग पर चलकर, के मुझे लक्ष्य को पाना है

फिर दीन-दुखी की सेवा कर, करुणा का पाठ पढ़ाना है

यश फैले धरती पर इतना जितना धरती पर पानी हो

सदियों तक चलती रहे सदा मेरी भी कोई कहानी हो

मैं यही सोच अपने मन में फिर जन सेवा में आया हूं

तुम मुझको प्रज्ञावान करो मैं शरण धम्म की आया हूं


हे महाकारुणिक बुद्ध! मुझे आनंद समझ लेना अपना

अरहत बनकर मैं नाम करूं मेरा केवल है ये सपना

जो मन में मैंने ठाना है वो जल्दी मुझको मिल जाए

तब नया सबेरा हो मेरा सब अंधकार ये मिट जाए

हम सबने यह प्रण ठाना है यह बौद्ध संघ बढ़ाने का

एक बार पुनः इस धरती पर ये धम्म ध्वजा लहराने का

मैं बुद्ध चुनो या युद्ध चुनो का मार्ग बताने आया हूं

तुम मुझको प्रज्ञावान करो मैं शरण संघ की आया हूं


हे बुद्ध तथागत! चरणों में मैं याचक बनकर आया हूं

तुम मुझको प्रज्ञावान करो मैं शरण संघ की आया हूं



©प्रशान्त 'अरहत'

शाहाबाद, हरदोई (उत्तर प्रदेश)