सुनायें दास्ताँ क्या तुमको इस ज़माने की,
ये ना सुनने की है और ना ही है सुनाने की,
ना जाने और कितने इम्तिहान बाकी हैं,
के कोई हद ही नहीं उनकी आज़माने की,
जो चाहते हो मेरे लब पे तुम हंसी जाना,
वजह भी दो मुझे फ़िर कोई मुस्कुराने की,
हर एक रहगुज़र को भूले बस ये बाकी हैं,
इक वस्ले-य़ार की और इक तेरे मैख़ाने की,
मुझे भी शौक ना था दास्ताँ सुनाने का,
उनकी आदत भी कुछ ऐसी है भूल जाने की,
सुनायें दास्ताँ क्या तुमको इस ज़माने की,
ये ना सुनने की है और ना ही है सुनाने की........