जीवन श्रृंखला है प्रश्नों की जिनके उत्तर पता नहीं खोज नहीं थी उनकी जब तक तब तक सब सही था- सरल,सपाट,प्रत्याशित!

फिर एक क्षण उभरा एक पुस्तक के अंतिम पृष्ठों पर ढूँढे मैंने उत्तर, हताश! सारे पृष्ठ सादे थे सब स्वप्न भी आधे-आधे थे।

फिर मैं चींटी बन कर चल पड़ा सीधी लकीरों पर एक के पीछे एक निर्बाधित; कि किसी ने आटा डालकर भटका दिया सदैव के लिये।

अब मात्र प्रश्न बचे हैं प्रेम, द्वेष, ईर्ष्या, प्रतियोगिता अस्तित्व नहीं कुछ शेष काश! तुम्हारे सिगरेट के धुँए से भर पाता मैं अपना खालीपन।

क्या है मेरा जीवन? एक जिज्ञासु की जिजीविषा एक मुमुक्षु की मुमुक्षा या एक अधूरा सत्य सार्थक अपने अधूरेपन में ही।

जैसा भी है जो भी है उस नियंत्रक महाशक्ति से प्रार्थना है असीमित मेरी वाणी-विचारों को दे आराम मुझे शांत-प्रशान्त कर दो।

क्योंकि, अबूझे प्रश्नों की सीमा होती है संघर्ष की सीमा होती है सीमा होती है विप्लव की भी, बिखराव अब फैल रहा है उसे सीमित कर दो, शान्त होना है श्रेयस्कर टूट जाने से, क्योंकि शान्ति नहीं मिलती टूट जाने से मर जाने से, कदाचित मिल जाये प्रश्न समाप्त हो जाने से!