आठ गुना आठ का कमरा, कोने में रखी मेज़ जिस पर फैली है सालों की मेहनत जिसका न तो कोई रंग है न कोई आकार और न ही कोई अस्तित्व; बेतरतीब सी चिढ़ाती है उसके अस्तित्व को जो बिस्तर पर पड़ा हुआ पन्नों और सपनों में झूल रहा है।

आख़िर क्यों है इतना कठिन उस खुले दरवाज़े से भाग जाना न जाने किसने रस्सी से किस पाये से उसके पाँव बाँध दिये हैं?