तड़प कर सिहरने की तमन्ना है सेज़ की,ख्वाहिश है बाकी एक हसीं रंगरेज की।कहीं दूर हैं जो किसी शायर के शहर में,बस ,चिट्ठियों के भार से सहमी जमीं है मेज़ की।
तड़प कर सिहरने की तमन्ना है सेज़ की,
ख्वाहिश है बाकी एक हसीं रंगरेज की।
कहीं दूर हैं जो किसी शायर के शहर में,
बस ,
चिट्ठियों के भार से सहमी जमीं है मेज़ की।