उलझन


खुश हों तो कहते हैं थोड़ी शर्म करो

जहाँ में इतनी बदहवासी है

खुश ना हों तो कहते हैं कभी मुस्कुरा दो

जहाँ में पहले ही बदगुमानी है


किसी को पसंद करें तो कहते हैं

इतनी जल्दबाज़ी ना करो

कोई पसंद ना हो तो कहते हैं

कभी तो मिजाज़ ठीक करो


अभी खुद से ही मिल नहीं पाए हैं

कहते हैं की कभी बज़्म में चलो

बमुश्किल भीड़ में घुल ही पाए हैं

की कहते हैं अपनी राह चलो


चुप रहें तो कहते हैं

बड़े मगरूर हो

दिल खोल के रख दें तो कहते हैं

बड़े बेगैरत हो


उलझन में हूँ की

बे-नूर मेरा अज़्म न हो जाए कहीं

हार न जाये मेरी रौशनी


उलझन में हूँ की

बे-शक्ल मेरी आवाज़ न हो जाए कहीं

थम न जाए मेरी कलम


- प्रशांत