ग़र यह तय है मेरी हर बात तुम ग़लत समझो

तब तो बेहतर की तुम कुछ भी मत समझो


मुस्कुरा कर आज कल क्यूँ देखते हो हमें

इस रहम-ओ-करम की नहीं हमें आदत समझो


अब इसलिए भी मिलने हम आते नहीं तुम्हें

तुम्हारी यादों से नहीं मिलती है फ़ुरसत समझो


तरसते हों हर दाने को खुद बच्चे जिसके

क्या तुम उस किसान की हालत समझो


नादाँ हो जो हाकिम से कुछ उम्मीद करते हो

ज़िंदा हो अभी तक यह ग़नीमत समझो


धरम के नाम पे तुमको जो वहशत सिखाते हों

तुम कुछ तो उस रहबर की हक़ीक़त समझो


सिपाही जान से जाता है तुम्हारी अना बचाने को

सुनो ऐ सियासत-दाँ तुम इसे खेल मत समझो