जल रहे हैं वन, उपवन, जीवन
पड़ रहे हैं सूखे खेत हरे
जल रहे हैं मीलों तक जंगल
हैं जीव-जंतु सब डरे डरे
हर शाख शाख यूँ सुलगी है
जैसे प्रकृति विद्रोह करे
जैसे तीजे लोचन से शिव के
ज्वाला अग्नि की प्रबल बहे
जिस संतुलन पे था ब्रह्माण्ड टिका
वो तो उन्नति की भेंट चढ़े
पल पल तेज़ गति से अब
धरती का तापमान बढ़े
गाँव शहर ढह रहे यहाँ
डगमग- डगमग जब धरा हिले
भूकम्प कहीं, कहीं तूफ़ान
फल कर्मों के अब यहीं मिले
चट्टानें बर्फ़ की पिघल रहीं
सूरज ऊपर से वार करे
सूखे से ग्रस्त हैं गाँव कई
वर्षा कहीं रोके न रुके
अफ़सोस कहर बरसा है तो
उनके भी घर ढह चले
जो दूर थे कृतृम सुविधा से
जो प्रकृति के रहे मित्र घने
आग उगलते वातावरण में अब
जीव-जंतु निर्दोष मरे
धरती की पूजा करने वाले
भोले-भाले वो किसान मरे
युद्ध है अब छिड़ गया यहाँ
कौन जिये और कौन मरे
होना है भारी विद्ध्वंस
अब मुश्किल है कि कोई बचे


