"""ख्वाबों की कब्र"""""
सुनसान सी...
विरान सी...
जगह पर....
एक क्रब देखी मैंने...
शायद मेरी ही थी...
मेरे जिस्म की...
कब्र को खोदकर...
देखा मैंने...
कुछ अधुरें..
टूटे_फूटें...
अधमरे से....
दफ़न खवाब..
मिले मुझे....
दर्द सा उठा...
सीने में...
यूँ टटोलने लगा मैं....
घबराया सा...
छूने लगा मैं....
देखा उन्हें....
तो गर्म सी ....
चीख़ती सी...
कुछ पुछती सी....
यूँ सवालों भरी...
दबी सी....
आवाज ने छुआ मुझे.......
कहने लगे...
पलकों पर सज़ा कर...
यूँ गिराना जरूरी...
था क्या...
मुश्किलें आ रही थी...
तो रूक जाते..
कुछ पल...
यूँ जिंदा दफ़ना जरूरी...
था क्या....
लोग तो मेरे दुश्मन है...
हमेशा मुझे
चाहने वालो के...
राह में आते है...
उन्हें गिराते है....
तेरा गिर कर उठ..
न पाना...
निराशा के दीपक...
का तेरे आत्मविश्वास...
जलाना जरूरी...
था क्या..
समाज से डर..
जाना जरूरी...
था क्या...
यूँ तोड़ सा दिया...
अलफ़ाज़ों ने..
उसके...
सोचने पर मजबूर किया...
पर....
उसकी आहटों से...
अहसास हुआ..
अभी भी जिंदा है वो....
दफ़न है...
पर कुछ उम्मीदों...
भरी सांसों के सहारे...
जिंदा है वो....
हौसलों की एक...
चिनगारी सी उठीं...
उन्हें फिर से..
सजाने की..
ख्वाहिश सी उठी...
माना वक्त बीत गया...
है मेरे ही गलतियों...
के कारण...
बड़ती उम्र के...
सहारे उन्हें....
पाने की चाहत सी उठीं....
उन्हें...
फिर से पलकों पर...
सजा लिया मैंने...
उम्मीदों की सांसों के...
सहारे उठाया उनहे....
फिर से चल पड़ा...
मैं...
ख्वाबों के साथ...
ख्वाबों की ओर.....


