सडके लंबी है तो क्या हुआ?
मंजिल तक आखिर पहूँच हीं जाना है
चलते चले जाना है...
तनखां हुई खतंम तो अब खर्चा-पानी आखिर कहाँ
किसिको अब हमसे कोई सरोकार ना रहाँ
इसी सच्चाई के साथ अब जिना है
चलते चले जाना है...
हमे यह भ्रम था के कोई तो आएगा हमारे दुआरे
लेकींन देश खुद चल रहा पुंजीपतीयों के सहारे
फिर भी ऐतराज नहीं ज़ताना है
चलते चले जाना है...
विज्ञापनों के भुलभुलैया में राहतों का बोलबाला है
सच्चाई से कोई वाकिफ़ नही झूठ का हवाला है
आँखे मूंद कर हमें ये बोझ उठाना है
चलते चले जाना है...
हम पर ईल्जाम है के हमने सत्ता कि खिलाफत कीं है
सच्चाई तो ये है के खाली पेट ने हमींसे बगावत कीं है
तपती सडकों से अब यूहीं गूजर जाना है
चलते चले जाना है...
गाडीयां हमें लेने आती अकसर हमारे गाँव है
लेकींन देश में कहाँ अभी कोई चूनाव है
अंत में इसे भी भूल जाना है
चलते चले जाना है..
मानी नहीं है हमने अबतक कोई हार
बादशाहो से नहीं लगाऐंगे मदत कीं गुहार
मजदूर होने का दर्द सहते जाना है
चलते चले जाना है....
अच्छा होता हम लोग भी अपनी ग़रिबी बेच पाते
पैदल चलते हीं सहीं कुछ तो खां पाते
भुखें पेट रहकर भी जिंदा रहना है
चलते चले जाना है..
आंतो को भोजन कि आवश्यकता से आत्मनिर्भर बनाएंगे
गाँव कि हसीन यादों को थके पैरों का हमसफर बनाएंगे
मजदूरी से इकठ्ठा हुई ताकद को आजमाना है
चलते चले जाना है...
अब फ़रक नहीं पडता रास्तो पर ना भी हो उजाले
पड भी जाऐ मुसलसल चलने से पैरो में छाले
रात में भी सितारों को गिनते जाना है
चलते चले जाना है....
- प्रसाद देविदास नांदूरकर


