उस राह,उस गली,उस डगर से निकलते हुए
मुड़कर देखा नहीं हमने घर से निकलते हुए
बहुत मुश्किलों में वो मेरे दिल से बाहर निकला
मछली कब खुश रही है समंदर से निकलते हुए
इक मौसम में बना नशेमन,फिर बारिश आयी
परिंदा रो पड़ा घटा में शज़र से निकलते हुए
वो शख्स जिसके हाथ थामे तो खुदको जाना
हाथ काँपते हैं उसके बराबर से निकलते हुए
कोई झाँकता रहा दरीचे से शब भर,और हम
पूरी दुनिया छोड़ आये शहर से निकलते हुए

