बिखरा है चारो तरफ़ धुआँ-धुआँसमेट इन्हें तुम आसमां बना दो ।फैला है दूर-दुर तक घना अँधेराआ हमसफ़र कोई चराग़ जला दो ।भटकता रहा हूँ मैं यहाँ राह-राहसीनें से लगा लो मंज़िल बना दो ।~ @drpranavindian#PoetryNight
बिखरा है चारो तरफ़ धुआँ-धुआँसमेट इन्हें तुम आसमां बना दो ।फैला है दूर-दुर तक घना अँधेराआ हमसफ़र कोई चराग़ जला दो ।भटकता रहा हूँ मैं यहाँ राह-राहसीनें से लगा लो मंज़िल बना दो ।
~ @drpranavindian#PoetryNight