मैं तेरी धुप से तपती रेत पे जूते बैग से बंधे चला हु,

और अथाह से भरे समंदर से मुँह धोया है

मैंने रास्तो पे चलकर एक अलग देश को जाना है ,

और सड़को पे चलते मेरे देश को पहियों पे घूमते देखा है,

जो रेज़गारी दे देती ये ज़िन्दगी,

तो शायद बनता एक घर तेरी छाती पर,

जिसमे घुसने का रास्ता समंदर से होकर जाता,

और बहार निकलता मौसमी हवाओं में बहता हुआ,

या बिता देता कितनी ही शामें समुन्द्र को घुरता हुआ किसी cafe में बैठे -बैठे,

जो मछलियां तैर कर आती है उँगलियों तक वो मरी हुई होती ,

ज़िंदा होते है तो वो केकड़े,

इसलिए शायद में तेरे भीतर की गलियों में भटकता रहता कभी किनारे पर ना जाने के लिए,

होता जो मुझसे अगर तो ना जाने क्या- क्या करता में,

पर यह इतवार है जो जल्दी निकल जाता है,

वापस अपनी गलियों लौटने के लिए बुलाता है,

राहगीरों की तरह कुछ दिन का आश्रा लेना चाहता हु बस,

तू भी मेरी ही तरह तो है,

सांवला सा रंग और रंग बिरंगे कपडे पहने हुए,

बस इतना सा फ़र्क़ है तू समंदर से घिरा है फिर भी ठोस खड़ा है,

और में हवा में तैरता किसी मछली की तरह.....

-प्रणव जैन