
मैं तेरी धुप से तपती रेत पे जूते बैग से बंधे चला हु,
और अथाह से भरे समंदर से मुँह धोया है
मैंने रास्तो पे चलकर एक अलग देश को जाना है ,
और सड़को पे चलते मेरे देश को पहियों पे घूमते देखा है,
जो रेज़गारी दे देती ये ज़िन्दगी,
तो शायद बनता एक घर तेरी छाती पर,
जिसमे घुसने का रास्ता समंदर से होकर जाता,
और बहार निकलता मौसमी हवाओं में बहता हुआ,
या बिता देता कितनी ही शामें समुन्द्र को घुरता हुआ किसी cafe में बैठे -बैठे,
जो मछलियां तैर कर आती है उँगलियों तक वो मरी हुई होती ,
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