रास्ते को रोटी से लपेट कर खा गया समय का चौकीदार,

और छोड़ गया अपनी कुर्सी पे रखे घिसे पिटे जूते ,

पास में खड़ी ग्रीष्म की लालटेन में तेल डालने आयी बारिश ने,

बहा दिए किस्से किताबें और मेज़ पे रखे कांच के टुकड़े,

दुनिया सिमट कर एक नहर में लगी,

जहां से ताजे फलों के रास पर झिलमिलाती एक मधुमक्खी डेरा बना लिया,

कई देशो से लौट कर आये डाक पर अब घर की लकड़ी की दीमक लगी है,

सो रहा है सूर्य के सातों घोड़े अथाह निद्रा में,

देखो वो नीला रंग गायब हो गया है सतह से,

तितली सा नीला समुन्द्र अब कुर्सी पे रखे घिसे पिटे जूतों जैसा हो गया है,

कुर्सी, वही कुर्सी जिससे समय का चौकीदार छोड़ गया था,

अपनी निद्रा शांत करने |

-प्रणव