जब सूरज की किरणे ठीक सर पे होती है,

तो बरामदे में लगे नीम के पेड़ से

गली के आखरी दूकान पे बनती ताज़ा कचोरियों की तरह,

धूप छन के आती है

और कढ़ाई से बहार निकले हिस्सों की तरह

खिड़की ना जाने कितनी ही बूंदों को धकेल देती है ,

मेज़ तक पहुँचती है तो बस खुशनुमा कुछ किरणे

उन ज़रा से में बस इतनी ही रौशनी हो पाती है की,

या तो में कुछ लिख सकू या

बस अपने ख्यालों में डूबा रहु |

कमरे में कुछ बुरी बातें है

जैसे इतनी रौशनी कभी आयी ही नहीं,

की आँखें मल के उन् अधूरे पढ़े खतों को पूरा कर सकू

कभी इच्छा होती भी है तो कलम की स्याही इतनी पतली होती है की

लिखने का मन ही नहीं करता,

उम्मीद है की कभी तो हिम्मत करके वो बातें लिख सकूँ,

फिर इंतज़ार करूँगा उस दिन का

जब वो खत पोस्ट ऑफिस तक ले जाने की हिम्मत होगी |

टेबल के एक कोने में पड़े- पड़े दिन भर मुझे घूरते है ,

मेरे उनको पूरा ना कर पाने का अट्टहास करते है,

कॉपियों से फाड़े हुए पाने और लाये हुए लिफाफों की गिनती ,

दिन बा दिन बदल रही है,

और धूल खा रहे है कुछ शब्द,

जो कभी पहले ही कह दिए होते तो ठीक होता ,

ना लिखने की ज़रूरत पढ़ती और ना ही कमरे से इतना बेमाना होता,

सोचता हु कभी एक दिन,

ये सूरज की किरणे बिना टकराये मेज़ पे गिरे

तो शायद इतनी रौशनी हो की में

पूरा लिख सकू उन अधलिखे खतो को |

-प्रणव जैन