सूर्य उगता औ संसार मे रोशनी देता

सूर्य डूबता औ जग में अंधकार होता 

पृथ्वी नित्येव पश्चिम से पूरब धुरी पर घूर्णन करती

चाँद उगता है

एक दिन छोड़ नित मुंह टेढ़ा किए रहता

चौदह दिन तो गायब ही रहता

धरती अपने प्राकृतिक उपग्रह के लक्ष्य-पूर्णन करती 

कहाँ होता कभी इस नैसर्गिकता में शोर?

हे मनुज! मत करें कभी प्रकृति पर जोर।


जीवन मे दुख आता 

तो मेहनत से जीवन से सब दुख भाग पाता

जीवन मे सुख आता 

तो जीवन मे स्थायी सुख कदापि न रह पाता

संपन्न व्यक्ति के न चाहते हुए भी 

उसकी संपन्नता कुछ-न-कुछ गुमान ला ही देता

जो धन-दौलत को ही सब कुछ मान बैठा

तो उसे कभी-न-कभी यही दौलत हिला ही देता

लोग क्यों करते इस नश्वर दुनिया मे शोर?

हे मनुज! मत करें कभी प्रकृति पर जोर।


जिसे मिट्टी की खुशबू का एहसास है 

सर्वदा उनके लिए खुल होती तरक्की की राह

जिसे निज के साथ अन्यों से प्यार है

वैसे मानव कदपि नही करते हैं किसी से डाह

मूल आवश्यकता तो सबकी होती

अगर यह पूर्ति नही हो पाता तो सब हो जाते चिंतित

ज्ञानियों की सोच नित्य दिव्य होती

सबके विकास की न सोचने वाले हो जाते अकिंचित

फिर क्यों करें किसी के प्रति मत्सर शोर?

हे मनुज! मत करें कभी प्रकृति पर जोर।

               ~ © गंवरु प्रमोद