आज कुछ मज़ा सा आ रहा है पीने में
लगता है कोई खलिश उठी है सीने में

वो शख्स कल रात फिर भूखा सो गया
खुदारी की बू आ रही थी उसके पसीने में

तलब कुछ ऐसी थी उसकी, मिट ना सकी
वो परिंदा प्यासा मर गया सावन के महीने में

इक नज़र गुरुर से क्या देखा नाखुदा ने लहरों को
वो ठहरा समंदर उतर आया उसके सफीने में

बेखौफ़ जलाता था जो शख्स रोज़ बस्तियां
वो कल हाज़िरी लगा आया है मदीने में

परेशान हो गये है कश्मकश- ए-ज़िंदगी से हम
फ़क़त गम ही गम, अब रखा भी क्या है जीने में।।