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निंदिया रानी

निंदिया रानी,क्यों तू मुझसे आंख चुराए,

सारी रात मेरी आंखों ही आंखों में कट जाए।

चांद क्यों हंस रहा, यहतारों से बात करती ,

वह तो थक कर सो जाते, और मेरी सुबह हो जाती।

तू इनसे तो मिलती-जुलती, मुझसे क्यों दूर भागती।

पूरी रात तुझे पुकारूं, आंख मलमल तेरा रस्ता निहारुं।

रात मेरी जम्हाई लेती, तकिए के पल्लू से लिपट जाती,

रजाई खींचतान मुंह पर ढकते ,करवट बदलते बीत जाती।

विचार जो दुनिया से घूम कर आते,मेरे मस्तिष्क में घर बनाते,

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