प्रकोप ग्रीष्म ऋतु
का कुछ ऐसा
तप्त रहा था वातावरण
अग्नि जैसा
नजर टिकी थी सबकी एक जगह
कब आयेगी वर्षा यहां ।
गरज उठे बादल
हर्षित हो पड़े सब
की अब पानी बरसेगा
खेत लहरेगा ।
काले बादलों ने जमा लिया अपना साया
सूर्य भी इनका कुछ न कर पाया ।
वर्षा की दो बूंद पड़ी
कम हुई वो गर्मी सड़ी
पपीहे और मोरों को इसने खूब नचाया
मोर चाह कर भी खुद को थीरकने से न रोक पाया ।
रौद्र रूप इसने
अपना दिखलाया
फसलों को अपने
साथ बाहया
बाढ़ जैसा माहौल बनाया
पर इतने समय बाद जो वर्षा आई
इसलिए मजा बहुत आया ।
- प्रखर त्रिपाठी


