सूर्य का हूँ पुत्र मैं सुत पूत से जाना गया
जन्मा कुन्ती माँ के कोख से राधे द्वारा पाला गया
कवच कुंडल के साथ मे आया था एक शुरवीर मैं
सुत पूत के नाम से द्रोण ने किया मना
शिक्षा के लिए पहुँच गया पास भगवान परशुराम के
विष्णु के छठे अवतार , सबसे बड़े शिवभक्त वो
दिया था शिक्षा जिसने भीष्म और द्रोण को
पा कर शिक्षा परशूराम से हो गया निपुर्ण मैं
झूठ एक बोला था , छुपाया था गोत्र मैं
शिक्षा पूर्ण होने पर बताया जब सच उन्हें
दिया था श्राप गुरू ने उस दिन अपने शिष्य को
की भूल जाओगे तुम जब ,
होगी सबसे ज्यादा जरूरत मेरी विद्या की तुम्हें
एक मजबूरी थी , वचनों का था शौक मुझे
पूजता पांडवों के शीश से मैं कालभैरव को
देता न अगर मैं वचन कुंती माता को
कृष्ण ने किया था छल श्राप भी साथ था
कर्म भी कुछ गलत थे
तभी मौत के घाट था
महाभारत के पन्नों में नाम मेरा बुलंद है
दानवीर कर्ण की कहानियाँ भी संग है
कुरुक्षेत्र के मिट्टी को आज भी जाकर देख लो
खून है उस मिट्टी में
और आज भी कण कण में कर्ण है।
- प्रखर फ़ैयाज़


