जाने किस विधी का विधान है मनु,

कैसे इतनी कलाएँ जानता हैँ।

अपने दिल के ही टुकङे रख सामने,

अपना हाल्-ए-दिल बयाँ करता हैँ॥

पतझङ मे खुशहाल वृक्ष जैसे,

खुद गिरकर वसंत देता हैँ।

वैसे ही मनु खुद अंदर ही घुटकर,

अपना सर्वस्व लुटा देता हैँ॥

आधुनिक भारत एवं मानव-

डगमगा रहा है सम्मान धरती का,

मौन रहकर चुपचाप सह रहा हुँ मैँ।

और विषैली दुनिया मे अकेले,

विष-रहित घुम रहा हुँ मैँ॥

ना जाने कैसे बदलेँगे दिन,

जब मेरी पुकार सुनी जाएगी।

और इस भौतिक विषधर से दुनिया,

कब विषमुक्त हो पाएगी॥

कुछ सार नहि है मेरी इतनी गंभीर बातोँ का,

प्रलय आएगा जरुर,मैरी किताब के पन्नो का।

और जब तक होगा सबका भाग्य उदय,

ढेर लगा होगा,जिती-जागती लाशो का॥