सुनो ना मुझे लुभाने का शौक नही रहा कभी किसी को।

बस अदा ही है केवल बात करने की।

हा मैंने अभी तक कुछ छुपाने का तरकीब भी नहीं सोच पाया।

शायद हर चीज सोचा तेरे लिए

पर

औरो की तरह तुझे कुछ दिखाने का नहीं सोच पाया।

बस हर बात बताने से डरता रहा तुझसे।

हां पर कभी रहता था बेख़बर भी तो तुम्हारे ख्यालों में ही तो घूमता था।

हर चीज सोच कर भी बस तुझे लुभाने कि एक तरकीब नहीं सोची,

हा बस फर्क सिर्फ इतना था मेरे में कि,

तुम मंजिल को खोजते रहे और मै बेखबर उस मर्ज से केवल रास्ता बताता चला गया।

तुझे तो केवल हसने का कारण चाहिए था

मै बस तेरे साथ गम को भुलाता चला गया।

तुझे कही और देख

मै कही और डूबता चला गया।

हा कभी पास में पड़ा रहने वाला सूखा पत्ता भी,

आज किसी और के पास बिना हवा उड़ता चला गया।

मै उसे आजतक लुभा न सका था,

इसलिए आज उसने मुझे सबक सीखा कर चला गया।