तुम कृष्ण के पंचजन्य शंख का नाद हो ,
तुम शिव की जटा से प्रवाहित होती गंगा हो,
तुम खुद मे सशक्त और सक्षम हो,
तुम वो हो जिसमें माँ दुर्गा, काली, का उद्घोष है ,
तुम खुद मे सारा जहां जीतने कि काबिलियत,
और ब्रह्मांड को नाप लो,
तुम ज्ञान की अविरल सरिता,
तुम विज्ञान की प्रेरणा हो,
क्रोध ऐसा जिससे शीतलता भी क्षुब्ध हो जाए,


