यूँ अचानक याद आया,

जिंदगी का वो एक दिवस

स्तब्ध होकर रह गये थे

रो रहे थे भाग्य पर।


भूल क्या हो गई हमसे,

जो भोगेंगे विरह उम्र भर

हाथों में अपने देखकर 

लकीरों से हो रहे थे प्रश्न बस।


जब नहीं मिलना लिखा था,

फिर क्यूँ?

टकराये थे एक दूजे से हम।


जिसको हम अपना समझते थे,

अब वो पराया हो चुका था

स्वप्न जिसके आंखों ने देखें

वो किसी और आंखों में बस चुका था।


बाकी सब तो ठीक है,

बस मेरा एक काम करना

वर्षो के इस बंधन का

तुम सदा मान रखना।