अन्तिम बार मिलने पर,
विदा लेते वक्त उसने कहा था
"जब भी उदासी मुझे अपने आगोश में लेगी
सिर्फ तुम ही महसूस होगी
मेरी प्रसन्नता का एक मात्र कारण तुम ही तो हो"।
उस वक्त खुदा से उसकी,
हर वक्त की प्रसन्नता का दुआ मागते हुए
उसकी यादों से स्वयं को
आजाद करना ही मुनासिब समझा।
इस प्रकार अपनी दुआओं के जरिये,
मैंने अपने प्रेम धर्म की रक्षा कर ली।


