न मैं बांधना चाहता हूं,
न बंधना।

मैं ऐसा प्रेम चाहता हूं
जिसमें
न तुम बनो मेरी जरूरत
न मैं ही रहूं जरूरी।

ऐसा प्रेम
जिसके आधार में
न अभिलाषाएं हों,
न जरूरतें,
न वादे बेफिजूल हों,
न निभाने की बंदिशें।

बस
हम एक-दूसरे के
स्वतंत्र पसंद हों।

मैं चाहता हूं
एक स्वच्छंद प्रेम!
जहां
अलग होते रास्तों को भी
चुनना सहज हो।

- प्रद्युम्न