ये नदी की उस धार सा है, जो पर्वत की ढलान में, कहीं गुम सा हो जाता है, मगर फिर भी उसकी मौजूदगी, सदा कायम रहती है, मन के विषम आकार में, अस्तित्व के अदृश्य कोषों में, रूह के अमिट अनुभवों में | और इसका अनवरत एहसास होता रहता है, कभी अश्कों की तपती नमी में, कभी श्वासों के उथल पुथल में, कभी वाणी की खुश्क़ ध्वनियों में, कभी कर्णों की शूल चुभन में, कभी उँगलियों की स्तब्ध अवस्था में, कभी क्षुधा की ध्वस्त अग्नि में, कभी सीने कीअनम्य घुटन में |
ये विषाद इस दृष्टि के दायरे से, लुप्त होकर भी, अंतर्मन के दर्पण में, सदैव नज़र आता है, नदी की उस धार सा |