ये मायारुपी नभ,
है असीम अंधकार,
अविद्या का,
विष सा फैला हुआ,
मानव चित्त पर,
स्वापक भाव को तीव्र,
जिसमें रहकर करता है वो,
तामसिक आनंद का अनुभव,
और यूँही सदा रहता है,
इस तिमिर भोग की ललक में,
एक आवेगी उन्माद सा लिए |
इसे रोशन कर रहा है आज,
ये धवल अमृतांशु,
हर किरण जिसकी मिटा रही है,
परत दर परत इस अँधेरे को,
और भर रही है ज्ञान के,
इस प्रबल प्रकाश को,
चित्त की हर वृत्ति में,
संतुलित करते हुए हर भाव को,
सात्विकता की ओर,
एक परम गुरु की तरह,
बड़ी ही सहजता से |
प्रदीप्ति
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